देवशयनी एकादशी 2026: जुलाई 2026 में देवशयनी एकादशी कब है? जानें सही तिथि, शुभ मुहूर्त, पारण समय, पूजा विधि, चातुर्मास का महत्व, व्रत नियम और धार्मिक महत्व।
देवशयनी एकादशी 2026: सनातन धर्म में वर्षभर आने वाली सभी एकादशियों का विशेष महत्व माना गया है, लेकिन आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी सबसे महत्वपूर्ण एकादशियों में से एक है। इसे हरिशयनी एकादशी, पद्मा एकादशी और आषाढ़ी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इसी दिन भगवान श्रीहरि विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शैया पर योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं और अगले चार महीनों तक योगनिद्रा में रहते हैं। इसी कारण इस दिन से चातुर्मास का शुभारंभ होता है।
यदि आप जानना चाहते हैं कि जुलाई 2026 में देवशयनी एकादशी कब है, तो यहां जानें इसकी सही तिथि, शुभ मुहूर्त, पारण समय, पूजा विधि, व्रत के नियम, चातुर्मास का महत्व और इससे जुड़ी सभी महत्वपूर्ण जानकारी।
देवशयनी एकादशी 2026 कब है?
वर्ष 2026 में देवशयनी (हरिशयनी) एकादशी का व्रत शनिवार, 25 जुलाई 2026 को रखा जाएगा।
देवशयनी एकादशी 2026 तिथि और समय
● एकादशी तिथि प्रारंभ: 24 जुलाई 2026 (शुक्रवार)
● एकादशी तिथि समाप्त: 25 जुलाई 2026 (शनिवार)
● देवशयनी एकादशी व्रत: 25 जुलाई 2026, शनिवार
एकादशी व्रत हमेशा उदया तिथि के अनुसार रखा जाता है। इसलिए वर्ष 2026 में देवशयनी एकादशी का व्रत 25 जुलाई, शनिवार को रखा जाएगा।
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देवशयनी एकादशी 2026 शुभ मुहूर्त
पूजा के लिए प्रातःकाल स्नान करने के बाद भगवान विष्णु की आराधना करना सबसे उत्तम माना जाता है। यदि संभव हो तो अभिजीत मुहूर्त या प्रातःकालीन शुभ मुहूर्त में पूजा करें।
देवशयनी एकादशी का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार देवशयनी एकादशी के दिन भगवान श्रीहरि विष्णु चार महीनों के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। इस अवधि को चातुर्मास कहा जाता है। इन चार महीनों में भगवान शिव सृष्टि के संचालन का दायित्व संभालते हैं।
देवशयनी एकादशी का व्रत करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं और भक्तों को सुख, समृद्धि, आरोग्य, यश और आध्यात्मिक उन्नति का आशीर्वाद प्रदान करते हैं। इस दिन किए गए दान, जप, तप और पूजा का विशेष फल प्राप्त होने की मान्यता है।
चातुर्मास 2026 का महत्व
देवशयनी एकादशी से चातुर्मास प्रारंभ होता है, जो चार महीनों तक चलता है और देवउठनी एकादशी पर समाप्त होता है। धार्मिक दृष्टि से यह समय साधना, व्रत, भजन, जप, तप और आत्मचिंतन के लिए अत्यंत शुभ माना गया है।
इसी अवधि में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, नामकरण जैसे कई मांगलिक कार्य सामान्यतः नहीं किए जाते। भक्त इस दौरान सात्विक जीवन अपनाकर भगवान विष्णु की विशेष आराधना करते हैं।
देवशयनी एकादशी की पौराणिक कथा
देवशयनी एकादशी का उल्लेख पद्म पुराण, भविष्योत्तर पुराण तथा अन्य धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। मान्यता है कि इस व्रत की महिमा का वर्णन स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को किया था।
पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन समय में मांधाता नामक एक धर्मपरायण और न्यायप्रिय राजा थे। उनके राज्य में प्रजा सुखी थी और चारों ओर समृद्धि का वातावरण था। एक समय ऐसा आया जब राज्य में लगातार कई वर्षों तक वर्षा नहीं हुई। सूखे के कारण खेत बंजर हो गए, नदियां और तालाब सूखने लगे तथा प्रजा अन्न और जल के संकट से परेशान हो गई।
राजा मांधाता ने इस संकट से मुक्ति का उपाय जानने के लिए अनेक ऋषि-मुनियों से परामर्श लिया। अंततः वे महर्षि अंगिरा के आश्रम पहुंचे। महर्षि ने ध्यान लगाकर राजा से कहा कि यदि वे आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी का व्रत श्रद्धा और नियमपूर्वक करेंगे तथा भगवान श्रीहरि विष्णु की आराधना करेंगे, तो राज्य के सभी संकट दूर हो जाएंगे।
राजा मांधाता ने पूरे राज्य के साथ देवशयनी एकादशी का व्रत रखा और भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा की। व्रत के प्रभाव से भगवान विष्णु प्रसन्न हुए, वर्षा हुई, सूखा समाप्त हो गया और राज्य में फिर से खुशहाली लौट आई। तभी से देवशयनी एकादशी को सुख, समृद्धि और कल्याण प्रदान करने वाली एकादशी माना जाता है।
देवशयनी एकादशी पूजा सामग्री
देवशयनी एकादशी की पूजा के लिए निम्नलिखित सामग्री रखें-
● भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र
● पूजा चौकी
● पीला या लाल वस्त्र
● गंगाजल
● कलश
● आम या अशोक के पत्ते
● नारियल
● पंचामृत
● रोली, हल्दी और अक्षत
● चंदन
● पीले पुष्प
● तुलसी दल
● धूप और दीपक
● घी
● मौसमी फल
● पंचमेवा
● मिष्ठान
● नैवेद्य
● कपूर
● आरती की थाली
देवशयनी एकादशी पूजा विधि
1. ब्रह्म मुहूर्त में उठें
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ या पीले रंग के वस्त्र धारण करें।
2. पूजा स्थल तैयार करें
पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें और चौकी पर भगवान विष्णु एवं माता लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित करें।
3. कलश स्थापना करें
कलश में जल भरकर आम के पत्ते और नारियल रखें। इसे शुभता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
4. भगवान विष्णु का अभिषेक करें
यदि संभव हो तो भगवान विष्णु का पंचामृत से अभिषेक करें और फिर स्वच्छ जल से स्नान कराएं।
5. पूजा अर्पित करें
भगवान को चंदन, अक्षत, पीले पुष्प, तुलसी दल, धूप, दीप, नैवेद्य और फल अर्पित करें।
6. मंत्र जाप करें
पूजा के दौरान 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें।
7. विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें
यदि संभव हो तो विष्णु सहस्रनाम, श्रीमद्भगवद्गीता या श्रीहरि स्तोत्र का पाठ करें।
8. आरती करें
पूजा के अंत में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आरती करें तथा प्रसाद वितरित करें।
9. रात्रि जागरण
धार्मिक मान्यता है कि देवशयनी एकादशी की रात्रि में भजन-कीर्तन और भगवान का स्मरण करना अत्यंत पुण्यदायी होता है।
देवशयनी एकादशी व्रत के नियम
● दशमी तिथि से सात्विक भोजन करें।
● ब्रह्मचर्य का पालन करें।
● क्रोध, झूठ और विवाद से दूर रहें।
● तामसिक भोजन का सेवन न करें।
● चावल का सेवन न करें।
● भगवान विष्णु का अधिक से अधिक स्मरण करें।
● द्वादशी तिथि में समय पर पारण करें।
देवशयनी एकादशी के शक्तिशाली मंत्र
● ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
● ॐ नमो नारायणाय॥
● ॐ नारायणाय विद्महे।
वासुदेवाय धीमहि।
तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥
देवशयनी एकादशी में तुलसी का महत्व
देवशयनी एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी दल अवश्य अर्पित करें। धार्मिक मान्यता है कि तुलसी के बिना भगवान विष्णु की पूजा अधूरी मानी जाती है। हालांकि, एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते तोड़ने की बजाय एक दिन पहले ही उन्हें तोड़कर सुरक्षित रख लेना चाहिए।
देवशयनी एकादशी के दिन क्या करें?
देवशयनी एकादशी के दिन भगवान श्रीहरि विष्णु की भक्ति और सात्विक आचरण का विशेष महत्व माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन किए गए शुभ कार्यों से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।
● ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें।
● भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा करें।
● भगवान को तुलसी दल, पीले पुष्प और पंचामृत अर्पित करें।
● 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें।
● विष्णु सहस्रनाम, श्रीमद्भगवद्गीता या श्रीहरि स्तोत्र का पाठ करें।
● जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और दक्षिणा का दान दें।
● गाय को हरा चारा या गुड़ खिलाएं।
● मंदिर में घी का दीपक जलाएं।
● दिनभर सात्विक विचार रखें और क्रोध से बचें।
● शाम के समय भगवान विष्णु की आरती और भजन-कीर्तन करें।
देवशयनी एकादशी पर क्या नहीं करें?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एकादशी व्रत के दौरान कुछ कार्यों से बचना चाहिए-
● चावल का सेवन न करें।
● लहसुन, प्याज और तामसिक भोजन से दूर रहें।
● मांसाहार और शराब का सेवन न करें।
● झूठ, छल और कपट से बचें।
● किसी का अपमान या निंदा न करें।
● क्रोध और विवाद से दूर रहें।
● बिना कारण दिन में अधिक देर तक न सोएं।
● एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते न तोड़ें।
● नकारात्मक विचारों और बुरे कर्मों से बचें।
देवशयनी एकादशी व्रत में क्या खाएं?
यदि आप फलाहार व्रत कर रहे हैं, तो इन चीजों का सेवन कर सकते हैं-
● मौसमी फल
● दूध और दही
● मखाना
● साबूदाना
● सिंघाड़े का आटा
● कुट्टू का आटा
● राजगिरा
● शकरकंद
● मूंगफली
● नारियल पानी
● सूखे मेवे
● सेंधा नमक
देवशयनी एकादशी पर क्या दान करें?
सनातन परंपरा में इस दिन दान-पुण्य का विशेष महत्व बताया गया है। श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार निम्न वस्तुओं का दान किया जा सकता है-
● अन्न
● पीले वस्त्र
● घी
● फल
● छाता
● जल से भरा घड़ा
● गुड़
● दक्षिणा
● तुलसी का पौधा
● जरूरतमंदों को भोजन
देवशयनी एकादशी व्रत के लाभ
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार देवशयनी एकादशी का व्रत करने से-
● भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
● पापों के क्षय की मान्यता है।
● घर में सुख-समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है।
● मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।
● दांपत्य जीवन में मधुरता बनी रहती है।
● परिवार में सुख और सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है।
● मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
देवशयनी एकादशी 2026 पारण समय
एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि में हरिवासर समाप्त होने के बाद किया जाता है। पारण सूर्योदय के बाद निर्धारित शुभ समय में करना चाहिए।
नोट: पारण का सटीक समय आपके शहर के सूर्योदय और स्थानीय पंचांग के अनुसार कुछ मिनट बदल सकता है।
निष्कर्ष:
देवशयनी एकादशी 2026 का व्रत 25 जुलाई 2026, शनिवार को रखा जाएगा। यह दिन भगवान श्रीहरि विष्णु की भक्ति, व्रत, जप, तप, दान-पुण्य और आध्यात्मिक साधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। इसी दिन से चातुर्मास का आरंभ होता है, इसलिए इसका धार्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है।
यदि आप श्रद्धा और विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा करते हैं तथा व्रत के नियमों का पालन करते हैं, तो धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सुख, समृद्धि, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
वर्ष 2026 में देवशयनी एकादशी का व्रत 25 जुलाई, शनिवार को रखा जाएगा।
इसे हरिशयनी एकादशी, आषाढ़ी एकादशी और पद्मा एकादशी भी कहा जाता है।
इस दिन से चातुर्मास का शुभारंभ होता है।
चातुर्मास चार महीने तक चलता है और देवउठनी एकादशी पर समाप्त होता है।
हाँ, महिलाएं भी श्रद्धा और अपनी स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार यह व्रत रख सकती हैं।
हाँ, अधिकांश श्रद्धालु फलाहार के साथ व्रत रखते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एकादशी के दिन चावल का सेवन वर्जित माना गया है।
हाँ, इस दिन श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र, घी, फल और दक्षिणा का दान शुभ माना जाता है।
धार्मिक परंपराओं के अनुसार देवशयनी एकादशी से चातुर्मास शुरू होने के कारण इस अवधि में विवाह जैसे मांगलिक कार्य सामान्यतः नहीं किए जाते।
नहीं। परंपरा के अनुसार एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़े जाते। पूजा के लिए तुलसी दल एक दिन पहले ही तोड़कर रख लेना चाहिए।
यह आपकी पारिवारिक परंपरा और व्रत के नियमों पर निर्भर करता है। कई लोग फलाहार के साथ चाय लेते हैं, जबकि कुछ केवल फल, दूध और पानी का सेवन करते हैं।
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