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Santan Saptami 2026: संतान सप्तमी 2026 व्रत कब है? जानिए शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, व्रत कथा और व्रत का महत्व

Santan Saptami 2026: संतान सप्तमी 2026 व्रत कब है? जानिए शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, व्रत कथा और व्रत का महत्व
By Pt. Jitendra Vyas | Sep-14-2026

Santan Saptami 2026: संतान सप्तमी 2026 कब है? जानें व्रत की सही तारीख, शुभ मुहूर्त, पूजा सामग्री, संतान डोरा, पूजा विधि, व्रत कथा और धार्मिक महत्व।

Santan Saptami 2026: हिंदू धर्म में संतान सप्तमी का व्रत संतान के सुख, अच्छे स्वास्थ्य, दीर्घायु और उज्ज्वल भविष्य की कामना के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की पूजा करने से संतान पर ईश्वर की कृपा बनी रहती है।

भाद्रपद शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाए जाने वाले इस व्रत को लेकर हर साल श्रद्धालुओं में उत्सुकता रहती है। तो आइए जानते हैं इस दिन से जुड़ी पूरी जानकारी।

संतान सप्तमी 2026 कब है? (Santan Saptami 2026 Date)

पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि 17 सितंबर 2026 को सुबह 10:48 बजे शुरू होगी और 18 सितंबर 2026 को दोपहर करीब 1 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि के आधार पर संतान सप्तमी व्रत 18 सितंबर 2026, शुक्रवार को रखा जाएगा।

संतान सप्तमी 2026 तिथि

  • संतान सप्तमी व्रत: 18 सितंबर 2026, शुक्रवार
  • सप्तमी तिथि प्रारंभ: 17 सितंबर 2026, सुबह 10:48 बजे
  • सप्तमी तिथि समाप्त: 18 सितंबर 2026, दोपहर करीब 1:00 बजे
  • मास: भाद्रपद
  • पक्ष: शुक्ल पक्ष
  • तिथि: सप्तमी

इसलिए यदि आप संतान सप्तमी 2026 की तारीख खोज रहे हैं, तो संतान सप्तमी व्रत 18 सितंबर 2026 को रखा जाएगा।

संतान सप्तमी 2026 शुभ मुहूर्त (Santan Saptami 2026 Shubh Muhurat)

अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:08 बजे से 12:57 बजे तक
इस दौरान भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की पूजा करना शुभ माना जाता है।

संतान सप्तमी व्रत में सात अंक का विशेष महत्व

संतान सप्तमी व्रत में ‘सात’ अंक का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। स्वयं सप्तमी तिथि चंद्र मास की सातवीं तिथि होती है, इसलिए इस व्रत की पूजा और परंपराओं में भी सात अंक का बार-बार प्रयोग दिखाई देता है।

व्रत के दौरान संतान डोरे में सात गांठें लगाई जाती हैं। भगवान को सात पूए अर्पित करने की परंपरा भी कई स्थानों पर मिलती है। इसी तरह दान और प्रसाद से जुड़ी कुछ परंपराओं में भी सात की संख्या का विशेष ध्यान रखा जाता है। कुछ परिवारों में पूजा के बाद चौकी या वेदी की सात परिक्रमा करने की परंपरा भी है।

इन सभी परंपराओं के पीछे सात अंक की पुनरावृत्ति को संकल्प, निरंतरता और पूर्णता का प्रतीक माना जाता है। एक मां की अपने बच्चे के लिए की गई प्रार्थना केवल एक बार की जाने वाली प्रार्थना नहीं होती, बल्कि उसके मन में संतान के सुख और सुरक्षा की कामना लगातार बनी रहती है। संतान सप्तमी की पूजा में सात की पुनरावृत्ति इसी निरंतर प्रार्थना और संकल्प की भावना को दर्शाती है।

संतान डोरा: संतान सप्तमी व्रत का हृदय

अगर संतान सप्तमी व्रत से जुड़ी किसी एक प्रमुख परंपरा को याद रखना हो, तो वह है संतान डोरा

संतान डोरा एक सूती धागे से तैयार किया जाता है, जिसमें सात गांठें लगाई जाती हैं। इसके बाद इसे हल्दी या केसर से पीला किया जाता है। पूजा के दौरान इस डोरे को भगवान शिव और माता पार्वती के सामने रखकर अन्य पूजन सामग्री के साथ अर्पित किया जाता है। पूजा पूरी होने के बाद व्रत रखने वाली महिला इसे अपनी कलाई पर बांधती है।

यहां एक महत्वपूर्ण बात यह है कि संतान डोरा बच्चे की कलाई पर नहीं, बल्कि मां की कलाई पर बांधा जाता है। इसे मां के संकल्प और संतान की रक्षा के लिए की गई प्रार्थना का प्रतीक माना जाता है।

कई जगह संतान डोरे के लिए साधारण मौली या कलावा भी इस्तेमाल किया जाता है। कुछ घरों में इसे हल्दी से रंगकर पूजा में शामिल करने की परंपरा है। यह डोरा अगले वर्ष आने वाली संतान सप्तमी तक सुरक्षित रखा जाता है और अगले व्रत के समय पुराने डोरे को बदलकर नया डोरा धारण किया जाता है।

संतान सप्तमी व्रत कथा

संतान सप्तमी व्रत कथा का वर्णन धार्मिक परंपराओं में भगवान श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर के संवाद के रूप में मिलता है। प्रचलित कथा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को इस व्रत की महिमा बताते हुए इसके महत्व और इससे जुड़ी कथा सुनाई थी।

राजा नहुष और रानी चंद्रमुखी की कथा

प्राचीन समय में अयोध्या नगरी में राजा नहुष राज्य करते थे। उनकी पत्नी का नाम रानी चंद्रमुखी था। उसी नगर में विष्णुदत्त नाम के एक ब्राह्मण अपनी पत्नी रूपवती के साथ रहते थे। रानी चंद्रमुखी और रूपवती आपस में घनिष्ठ मित्र थीं।

एक दिन दोनों महिलाएं सरयू नदी में स्नान करने गईं। वहां उन्होंने कुछ महिलाओं को भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करते हुए देखा। रानी और रूपवती ने जब उनसे पूजा का कारण पूछा, तो उन महिलाओं ने बताया कि वे संतान के सुख, स्वास्थ्य और कल्याण की कामना से संतान सप्तमी का व्रत कर रही हैं।

यह सुनकर रानी चंद्रमुखी और रूपवती भी इस व्रत से प्रभावित हुईं। दोनों ने भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की और संकल्प लिया कि वे भी श्रद्धापूर्वक संतान सप्तमी का व्रत करेंगी।

जब रानी अपना संकल्प भूल गईं

रूपवती ने अपने घर लौटकर इस संकल्प को पूरी श्रद्धा से निभाया। वह प्रत्येक वर्ष संतान सप्तमी का व्रत रखतीं और भगवान शिव-पार्वती की पूजा करके संतान के सुख और कल्याण की कामना करतीं।

वहीं, रानी चंद्रमुखी राजमहल के कार्यों और जिम्मेदारियों में इतनी व्यस्त हो गईं कि धीरे-धीरे वह अपने संकल्प को भूल गईं और संतान सप्तमी का व्रत करना बंद कर दिया। समय बीतता गया और दोनों की मृत्यु हो गई।

अगले जन्म में मिला व्रत का फल

धार्मिक कथा के अनुसार, रूपवती ने संतान सप्तमी का व्रत श्रद्धा और नियमपूर्वक किया था। इसलिए अगले जन्म में उसे ईश्वरी नाम की ब्राह्मण महिला के रूप में जन्म मिला। उसे कई स्वस्थ और बलवान पुत्रों का सुख प्राप्त हुआ।

दूसरी ओर, रानी चंद्रमुखी ने संतान सप्तमी का संकल्प लिया था, लेकिन उसे पूरा नहीं किया। कथा के अनुसार उसे पहले वानरी (बंदर) के रूप में जन्म लेना पड़ा। इसके बाद उसने मानव जन्म प्राप्त किया और विमला नाम की रानी बनी, लेकिन इस जन्म में भी वह संतान सुख से वंचित रही।

इस कथा के माध्यम से संतान सप्तमी व्रत के संकल्प, श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत करने के महत्व को समझाया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि व्रत का संकल्प लेने के बाद उसे श्रद्धापूर्वक पूरा करना चाहिए।

कथा का संदेश

संतान सप्तमी व्रत कथा का मूल संदेश केवल संतान प्राप्ति तक सीमित नहीं है। यह कथा संकल्प को निभाने, श्रद्धा बनाए रखने और संतान के कल्याण के लिए ईश्वर से प्रार्थना करने की भावना को दर्शाती है।

इसी कारण संतान सप्तमी के दिन व्रत रखने वाले श्रद्धालु भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने के साथ व्रत कथा का श्रवण करते हैं और अपनी संतान के स्वस्थ, सुखी एवं दीर्घायु जीवन की प्रार्थना करते हैं।

संतान सप्तमी पूजा विधि (Santan Saptami Puja Vidhi)

संतान सप्तमी पूजा विधि के दौरान भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। पूजा की सामान्य विधि इस प्रकार है:

  • स्नान और संकल्प: सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। भगवान का ध्यान कर संतान के सुख-स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की कामना से व्रत का संकल्प लें।
  • चौकी स्थापित करें: पूजा स्थान पर चौकी रखकर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं और भगवान शिव, माता पार्वती व गणेश जी की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।
  • संतान डोरा तैयार करें: सूती धागे में सात गांठें लगाकर उसे हल्दी या केसर से पीला करें और भगवान के सामने पूजा में रखें।
  • शिव-पार्वती का पूजन: भगवान शिव को जल, बेलपत्र, चंदन, अक्षत और फूल अर्पित करें। माता पार्वती को रोली, अक्षत, फूल और सुहाग सामग्री चढ़ाएं। धूप-दीप जलाएं।
  • सात पूए का भोग: सात मीठे पूए और पंचमेवा या फल भगवान को नैवेद्य के रूप में अर्पित करें। सात पूए चढ़ाने की परंपरा क्षेत्र के अनुसार अलग हो सकती है।
  • व्रत कथा और आरती: संतान सप्तमी व्रत कथा पढ़ें या सुनें। इसके बाद भगवान शिव-पार्वती और गणेश जी की आरती करें।
  • डोरा बांधें और पारण करें: पूजा के बाद संतान डोरा अपनी कलाई पर बांधें। अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार दान करें और निर्धारित विधि से व्रत का पारण करें।

संतान सप्तमी पूजा सामग्री

संतान सप्तमी की पूजा के लिए सामान्य रूप से इन चीजों का इस्तेमाल किया जाता है:

  • भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी की तस्वीर या प्रतिमा
  • जल
  • पंचामृत
  • बेलपत्र
  • फूल
  • अक्षत
  • रोली या कुमकुम
  • धूप और दीपक
  • फल
  • मिठाई
  • दूर्वा
  • नैवेद्य
  • माता पार्वती के लिए सुहाग सामग्री

संतान सप्तमी पर भगवान को क्या भोग लगाएं?

संतान सप्तमी पर भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी को सात्विक भोग लगाने की परंपरा है। फल, मिठाई, खीर और घर में बनाए गए अन्य सात्विक पकवान भोग में रखे जा सकते हैं। कुछ क्षेत्रों में इस दिन मीठी पूरी या पुआ बनाकर भगवान को अर्पित करने की परंपरा भी है।

संतान सप्तमी व्रत का महत्व (Importance of Santan Saptami Vrat)

संतान सप्तमी व्रत का महत्व हिंदू धर्म में संतान के कल्याण से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने से संतान पर उनका आशीर्वाद बना रहता है। इस व्रत को मुख्य रूप से इन कामनाओं से जोड़ा जाता है:

  • संतान का अच्छा स्वास्थ्य
  • संतान की लंबी आयु
  • संतान की सुख-समृद्धि
  • संतान की सफलता
  • परिवार में सुख-शांति
  • संतान संबंधी परेशानियों से मुक्ति की कामना

इसी वजह से विवाहित महिलाएं और माता-पिता इस दिन श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना करते हैं।

निष्कर्ष:

Santan Saptami 2026 का व्रत 18 सितंबर 2026, शुक्रवार को रखा जाएगा। भाद्रपद शुक्ल सप्तमी तिथि 17 सितंबर से शुरू होकर 18 सितंबर को दोपहर तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर 18 सितंबर को संतान सप्तमी मनाई जाएगी।

इस दिन भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी की पूजा, व्रत कथा का पाठ और संतान के अच्छे स्वास्थ्य, दीर्घायु एवं सुखी जीवन के लिए प्रार्थना करने की परंपरा है। यदि आप Santan Saptami 2026 Date, संतान सप्तमी शुभ मुहूर्त, संतान सप्तमी पूजा विधि, संतान सप्तमी व्रत कथा और संतान सप्तमी का महत्व जानना चाहते हैं, तो 18 सितंबर की तारीख जरूर नोट कर लें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

संतान सप्तमी 2026 कब मनाई जाएगी? +

संतान सप्तमी का व्रत 18 सितंबर 2026, शुक्रवार को रखा जाएगा।

संतान सप्तमी 2026 में सप्तमी तिथि कब शुरू होगी? +

सप्तमी तिथि 17 सितंबर 2026 को सुबह 10:48 बजे शुरू होगी।

संतान सप्तमी पर किस भगवान की पूजा होती है? +

संतान सप्तमी पर मुख्य रूप से भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की पूजा की जाती है।

संतान सप्तमी पर क्या चढ़ाना चाहिए? +

भगवान शिव को जल, बेलपत्र और फूल अर्पित किए जा सकते हैं। माता पार्वती को रोली, अक्षत, फूल और सुहाग सामग्री तथा गणेश जी को दूर्वा और मोदक अर्पित किए जा सकते हैं।

संतान सप्तमी व्रत में क्या खाना चाहिए? +

व्रत में फलाहार या सात्विक भोजन किया जा सकता है।

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